meethi boliyaan sun - be zubaani lamhon ki. meethi boliyaan sun - aasmaani rangon ki
Wednesday, 11 December 2013
Thursday, 25 July 2013
हंसती रहे तू हंसती रहे,
हया की लाली खिलती रहे
ज़ुल्फ के नीचे गर्दन पे
सुबह-ओ-शाम मिलती रहे
सोन्धी सी हंसी तेरी,
खिलती रहे मिलती रहे
पीली धूप पहन के तूम, देखो बाग में मत जाना
भन्वरे तुम को सब छेडेंगे, फूलों में मत जाना
मद्धम मद्धम हंस दे फिर से,
सोना सोना फिर से हंस दे
ताज़ा गिरे पत्ते कि तरह सब्ज लान पर लेटे हुए
साथ रंग हैं बहारों के, एक अदा में लपेटे हुए
सावन भादों सारे तुम से,
मौसम मौसम हंसते रहना
मद्धम मद्धम हंसते रहना
कभी नीले आस्मान पे चलो घूमनें चलें हम
कोइ अब्र मिल गया तो, ज़मीन पे बरस लें हम
तेरी बाली हिल गई है,
कभी शब चमक उठी हैं, कभी शाम खिल गयी है
तेरे बालों की पनाह में ये सियाह रात गुज़रे
तेरी काली काली आंखें कोई उजली बात उतरे
तेरी इक हंसी के बदले,
मेरी ये ज़मीन ले ले मेरा आस्मान ले ले
बर्फ गिरी हो वादी में, उन में लिपटी सिमती हुयी
बर्फ गिरी हो वादी में और हंसी तेरी गूंजी उन में
लिपटी सिमटी हुयी,
बात करे धुवाँ निकले
गरम गरम उजला धुवाँ,
नरम नरम उजला धुवाँ
- GULZAR
Wednesday, 24 July 2013
दोस्तों से झूठी मूठी दूसरों का नाम ले के,
फिर मेरी बातें करना,
यारा रात से दिन करना
लम्बी जुदायी तेरी बडा मुश्किल है
आहों से दिल भरना,
यारा रात से दिन करना
कब ये पूरी होगी दूर ये दूरी होगी,
रोज़ सफर करना,
यारा रात से दिन करना
चुपके से, चुपके से रात की चादर तले
चांद की भी आहट ना हो,
बादल के पीछे चले
जले कतरा कतरा,
गले कतरा कतरा,
रात भी ना हिले आधी आधी ये
फरवरी की सर्दियों की धूप में,
मूंदी मूंदी अंखियों से देखना हाथ की आड से, नीम्मी नीम्मी थंड और आग में
हौले हौले मारवा के राग में,
मीर की बात हो
दिन भी न डूबे रात ना आये,
शाम कभी न ढ़ले
शाम ढ़ले तो सुबह ना आये,
रात ही रात चले
तुझ बिना पगली ये पुरवई,
आके मेरी चुनरी में भर गयी
तु कभी ऐसे ही, आ गले लग जैसे ये पुरवई
साथिया, सुन तू, कल जो मुझु को नींद ना आये
पास बुला लेना
गोद में अपनी सर रख लेना, लोरी सुना देना
- GULZAR
Friday, 12 July 2013
Friday, 5 July 2013
पानी पानी रे
खारे पानी रे
नैनों में भर जा
नींदें खाली कर जा
पानी पानी इन पहाड़ों की ढलानों से उतर जाना
धुआं धुआं कुछ वादियाँ भी आएँगी गुज़र जाना
इक गाँव आएगा मेरा घर आएगा
जा मेरे घर जा
नींदें खाली कर जा..
ये जैसी रातें जगरातों में बिता देना
मेरी आँखों में जो बोलनी के पाखे को उड़ा देना
बर्फों में लगे मौसम पिघले
मौसम हरे कर जा
नींदें खाली कर जा..
- Gulzar, in movie 'Machis'
चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जावें वीर अनेक
- maakhan laal chaturvedi
Tuesday, 2 July 2013
आराम करो
एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।
" हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।
यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ -- है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।
मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ -- सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।
अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।
मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो। यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।
- गोपालप्रसाद व्यास
Saturday, 22 June 2013
Thursday, 20 June 2013
वक़्त को जितना गूंध सके हम, गूंध लिया
बंद कमरे में कभी कभी जब दीये की लौ हिल जाती है तो


