Wednesday, 11 December 2013


 मिलने वालों की तरह रोज़ मिला करें 
कोई राब्ता ना सही, चलो आँखों में  ही बसा करें 
यूँ खामोश रहने का भी तो कोई सबब नहीं 
और गर है तो मिल के खामोश हुआ करें 
ये फासला जो मुझमे और तुझमे है 
थोडा थोडा इसे ही मिटाया करें 
माना मरासिम नहीं तो मिल के क्या करोगे 
तो चलो, मिल के कुछ न किया करें 

पर मिलने वालों कि तरह - रोज़ मिला करें 

- रविशेखर मिश्रा

Thursday, 25 July 2013

हंसती रहे तू हंसती रहे,
हया की लाली खिलती रहे
ज़ुल्फ के नीचे गर्दन पे
सुबह-ओ-शाम मिलती रहे

सोन्धी सी हंसी तेरी,
खिलती रहे मिलती रहे

पीली धूप पहन के तूम, देखो बाग में मत जाना
भन्वरे तुम को सब छेडेंगे, फूलों में मत जाना
मद्धम मद्धम हंस दे फिर से,
सोना सोना फिर से हंस दे

ताज़ा गिरे पत्ते कि तरह सब्ज लान पर लेटे हुए
साथ रंग हैं बहारों के, एक अदा में लपेटे हुए
सावन भादों सारे तुम से,
मौसम मौसम हंसते रहना
मद्धम मद्धम हंसते रहना

कभी नीले आस्मान पे चलो घूमनें चलें हम
कोइ अब्र मिल गया तो, ज़मीन पे बरस लें हम
तेरी बाली हिल गई है,
कभी शब चमक उठी हैं, कभी शाम खिल गयी है

तेरे बालों की पनाह में ये सियाह रात गुज़रे
तेरी काली काली आंखें कोई उजली बात उतरे
तेरी इक हंसी के बदले,
मेरी ये ज़मीन ले ले मेरा आस्मान ले ले

बर्फ गिरी हो वादी में, उन में लिपटी सिमती हुयी
बर्फ गिरी हो वादी में और हंसी तेरी गूंजी उन में
लिपटी सिमटी हुयी,
बात करे धुवाँ निकले
गरम गरम उजला धुवाँ,
नरम नरम उजला धुवाँ

- GULZAR

Wednesday, 24 July 2013

दोस्तों से झूठी मूठी दूसरों का नाम ले के,
फिर मेरी बातें करना,
यारा रात से दिन करना
लम्बी जुदायी तेरी बडा मुश्किल है
आहों से दिल भरना,
यारा रात से दिन करना
कब ये पूरी होगी दूर ये दूरी होगी,
रोज़ सफर करना,
यारा रात से दिन करना

चुपके से, चुपके से रात की चादर तले
चांद की भी आहट ना हो,
बादल के पीछे चले
जले कतरा कतरा,
गले कतरा कतरा,
रात भी ना हिले आधी आधी ये

फरवरी की सर्दियों की धूप में,
मूंदी मूंदी अंखियों से देखना हाथ की आड से, नीम्मी नीम्मी थंड और आग में
हौले हौले मारवा के राग में,
मीर की बात हो
दिन भी न डूबे रात ना आये,
शाम कभी न ढ़ले
शाम ढ़ले तो सुबह ना आये,
रात ही रात चले

तुझ बिना पगली ये पुरवई,
आके मेरी चुनरी में भर गयी
तु कभी ऐसे ही, आ गले लग जैसे ये पुरवई
साथिया, सुन तू, कल जो मुझु को नींद ना आये
पास बुला लेना
गोद में अपनी सर रख लेना, लोरी सुना देना

- GULZAR

Friday, 12 July 2013


 दिन सुहाना था, शाम सुहानी थी 
तेरी पहलु में मेरी हर रात दीवानी थी 

इस फ़लक पे जो आज ग़ुबार देखते हो 
कल तलक यहाँ, बिखरी हुई चांदनी थी 

वीरान - सा ये समंदर, जो अफ़साने ढूंढता है 
कभी इसमें किसी चाँद के कश्ती की कहानी थी 

टूटा हुआ ये बादा - ओ - ज़ाम, और बिखरी हुई फज़ाएँ 
इसी मयखाने में कभी, मेरी जवानी थी 

उसे भुलाने की ता-उम्र कोशिश तो बहुत की मग़र 
मेरे वज़ूद में बस - उसी की कहानी थी 

रचनाकार - रविशेखर मिश्रा

Friday, 5 July 2013

पानी पानी रे
खारे पानी रे
नैनों में भर जा
नींदें खाली कर जा

पानी पानी इन पहाड़ों की ढलानों से उतर जाना
धुआं धुआं कुछ वादियाँ भी आएँगी गुज़र जाना
इक गाँव आएगा मेरा घर आएगा
जा मेरे घर जा
नींदें खाली कर जा..

ये जैसी रातें जगरातों में बिता देना
मेरी आँखों में जो बोलनी के पाखे को उड़ा देना
बर्फों में लगे मौसम पिघले
मौसम हरे कर जा
नींदें खाली कर जा..

- Gulzar, in movie 'Machis'

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पर जावें वीर अनेक 
- maakhan laal chaturvedi

Tuesday, 2 July 2013

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।
" हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ -- है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ -- सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।

भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।
मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो। यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।
         
               - गोपालप्रसाद व्यास

Saturday, 22 June 2013


 
 
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
 
रचनाकार: दुष्यंत कुमार

Thursday, 20 June 2013


वक़्त को जितना गूंध सके हम, गूंध लिया 
आंटे की मिख्दार कभी बढ़ भी जाती है 
भूख  मगर एक हद से आगे बढती नहीं 

पेट के मारों की ऐसी ही हालत है, भर जाये तो दस्तरखान से उठ जाते हैं 
आओ अब उठ जाएँ दोनों
कोई कचहरी का खूंटा दो
कि  इंसानों को दस्तरखान पे कब तक बाँध के रख सकता है कोई

कानूनी मोहरों से कब रुकते हैं, या कटते हैं रिश्ते 
रिश्ते राशन कार्ड तो नहीं
वक़्त को जितना गूंध सके हम, गूंध लिया
लेखक: गुलज़ार


मुझे तलाश नहीं है मगर वो मिलती है 
किसी  ख़याल के जुम्बिश-ए-आरज़ू  की तरह जिसका कोई चेहरा नहीं 
कोई बगूला हवा का ज़मीन से उड़ता हुआ 
या रौशनी हो कहीं और एक साया बहुत पास गिरे
किताब  खोलूं तो किरदार गिर पड़े कोई 
मैं जानता भी नहीं की कौन है मगर बाविस्ता है मुझसे
मुझे तलाश नहीं है मगर वो मिलती है

लेखक: गुलज़ार

न  आने की आहट  न जाने की टोह  मिलती है 
कब आते हो कब जाते हो 

इमली का ये पेड़ हवा में हिलता है तो 
ईंटों की दीवार पे परछाई का छीटा पड़ता है 
और जज़्ब हो जाता है, जैसे सूखी मिटटी पर कोई पानी का कतरा फेंक गया हो 
धीरे धीरे आँगन में फिर धुप सिसकती रहती है 
कब आते हो कब जाते हो

बंद कमरे में कभी कभी जब दीये की लौ हिल जाती है तो 
एक बड़ा सा साया मुझको घूँट घूँट पीने लगता है 
आँखें मुझसे दूर बैठकर मुझको देखती रहती है
कब आते हो कब जाते हो 

दिन में कितनी बार मुझको -  तुम याद आते हो
- लेखक: गुलज़ार