मुझे तलाश नहीं है मगर वो मिलती है
किसी ख़याल के जुम्बिश-ए-आरज़ू की तरह जिसका कोई चेहरा नहीं
कोई बगूला हवा का ज़मीन से उड़ता हुआ
या रौशनी हो कहीं और एक साया बहुत पास गिरे
किताब खोलूं तो किरदार गिर पड़े कोई
मैं जानता भी नहीं की कौन है मगर बाविस्ता है मुझसे
मुझे तलाश नहीं है मगर वो मिलती है
लेखक: गुलज़ार
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