Saturday, 25 July 2015

यार से ऐसी यारी रख
दुःख में भागीदारी रख,
चाहे लोग कहे कुछ भी
तू तो जिम्मेदारी रख,
वक्त पड़े काम आने का
पहले अपनी बारी रख,
मुसीबते तो आएगी
पूरी अब तैयारी रख,
कामयाबी मिले ना मिले
जंग हौंसलों की जारी रख,
बोझ लगेंगे सब हल्के
मन को मत भारी रख,
मन जीता तो जग जीता
कायम अपनी खुद्दारी रख.

Tuesday, 3 February 2015



खामोशियाँ आवाज़ हैं, तुम सुनने तो आओ कभी 
छूकर तुम्हें खिल जाएंगी, ग़र  इनको बुलाओ कभी 
बेक़रार हैं बात करने को, कहने दो इनको ज़रा - 
खामोशियाँ - तेरी मेरी खामोशियाँ 
खामोशियाँ - लिपटी हुई खामोशियाँ 

क्या उस गली में कभी तेरा जाना हुआ 
जहां से ज़माने को गुज़रे हुए ज़माना हुआ 
मेरा समय तो वहीँ पे है ठहरा हुआ 
बताऊँ तुम्हें क्या मेरे साथ क्या क्या हुआ 

खामोशियाँ एक साज़ है, तुम धुन कोई लाओ ज़रा 
खामोशियाँ अलफ़ाज़ हैं , कभी आ गुनगुना ले ज़रा 
बेक़रार हैं, बात करने को - कह दो इनको ज़रा - 
खामोशियाँ - तेरी मेरी खामोशियाँ 
खामोशियाँ - लिपटी हुई खामोशियाँ 

नदिया का पानी भी खामोश बहता यहां 
खिली चांदनी में छिपी लाख खामोशियाँ 
बारिश की बूंदों की होती कहाँ है जुबां 
सुलगते दिलों में है खामोश उठता धुंआ 

खामोशियाँ आकाश है, तुम उड़ने तो आओ ज़रा 
खामोशियाँ एहसास है, तुम्हें मेहसूस होती है क्या 
बेक़रार हैं, बात करने को - कह दो इनको ज़रा - 
खामोशियाँ - तेरी मेरी खामोशियाँ 
खामोशियाँ - लिपटी हुई खामोशियाँ 

- रश्मि सिंघ 
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Wednesday, 5 November 2014


ना ज़ी भर के देखा, ना कुछ बात की 
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की 

कई साल से कुछ खबर ही नहीं 
कहाँ दिन ग़ुज़ारा कहाँ रात की 

उजालों की परियां नहाने लगी 
नदी गुनगुनाये खयालात की 

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गयी 
ज़बाँ सब समझते हैं जज़्बात की 

सितारों को कुछ खबर ही नहीं 
मुसाफिर ने जाने कहाँ रात की 

ना ज़ी भर के देखा, ना कुछ बात की 
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की

- डॉ बशीर बद्र 

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Friday, 8 August 2014

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मुक़ाम किस का था

न पूछ-ताछ थी किसी की वहाँ न आवभगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़
कहो, वो तज़्किरा-ए-नातमाम किसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

अगर्चे देखने वाले तेरे हज़ारों थे
तबाह हाल बहुत ज़ेरे-बाम किसका था

हर इक से कहते हैं क्या 'दाग़' बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था

#दाग़ देहलवी

Thursday, 7 August 2014

तेरे ज़लवे अब मुझे हर सू नज़र आने लगे 
काश ये भी हो की मुझमे तू नज़र आने लगे 

इब्तेदा ये थी के देखी थी ख़ुशी की एक झलक 
इंतेहा ये है के ग़म हर सू नज़र आने लगे 

बेक़रारी बढ़ते बढ़ते दिल की फ़ितरत बन गयी 
शायद अब तस्कीन का पहलू नज़र आने लगे 

ख़त्म कर दे ऐ सबा अब शाम-ए -ग़म की दास्ताँ 
देख उन आँखों में भी आँसूं नज़र आने लगे 

सू = तरफ 
इब्तेदा = शुरुआत 
तस्कीन = शान्ति

Tuesday, 27 May 2014


लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं

#राहत इन्दौरी

Wednesday, 11 December 2013


 मिलने वालों की तरह रोज़ मिला करें 
कोई राब्ता ना सही, चलो आँखों में  ही बसा करें 
यूँ खामोश रहने का भी तो कोई सबब नहीं 
और गर है तो मिल के खामोश हुआ करें 
ये फासला जो मुझमे और तुझमे है 
थोडा थोडा इसे ही मिटाया करें 
माना मरासिम नहीं तो मिल के क्या करोगे 
तो चलो, मिल के कुछ न किया करें 

पर मिलने वालों कि तरह - रोज़ मिला करें 

- रविशेखर मिश्रा