ना ज़ी भर के देखा, ना कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
कई साल से कुछ खबर ही नहीं
कहाँ दिन ग़ुज़ारा कहाँ रात की
उजालों की परियां नहाने लगी
नदी गुनगुनाये खयालात की
मैं चुप था तो चलती हवा रुक गयी
ज़बाँ सब समझते हैं जज़्बात की
सितारों को कुछ खबर ही नहीं
मुसाफिर ने जाने कहाँ रात की
ना ज़ी भर के देखा, ना कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
- डॉ बशीर बद्र
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