Saturday, 22 June 2013


 
 
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
 
रचनाकार: दुष्यंत कुमार

Thursday, 20 June 2013


वक़्त को जितना गूंध सके हम, गूंध लिया 
आंटे की मिख्दार कभी बढ़ भी जाती है 
भूख  मगर एक हद से आगे बढती नहीं 

पेट के मारों की ऐसी ही हालत है, भर जाये तो दस्तरखान से उठ जाते हैं 
आओ अब उठ जाएँ दोनों
कोई कचहरी का खूंटा दो
कि  इंसानों को दस्तरखान पे कब तक बाँध के रख सकता है कोई

कानूनी मोहरों से कब रुकते हैं, या कटते हैं रिश्ते 
रिश्ते राशन कार्ड तो नहीं
वक़्त को जितना गूंध सके हम, गूंध लिया
लेखक: गुलज़ार


मुझे तलाश नहीं है मगर वो मिलती है 
किसी  ख़याल के जुम्बिश-ए-आरज़ू  की तरह जिसका कोई चेहरा नहीं 
कोई बगूला हवा का ज़मीन से उड़ता हुआ 
या रौशनी हो कहीं और एक साया बहुत पास गिरे
किताब  खोलूं तो किरदार गिर पड़े कोई 
मैं जानता भी नहीं की कौन है मगर बाविस्ता है मुझसे
मुझे तलाश नहीं है मगर वो मिलती है

लेखक: गुलज़ार

न  आने की आहट  न जाने की टोह  मिलती है 
कब आते हो कब जाते हो 

इमली का ये पेड़ हवा में हिलता है तो 
ईंटों की दीवार पे परछाई का छीटा पड़ता है 
और जज़्ब हो जाता है, जैसे सूखी मिटटी पर कोई पानी का कतरा फेंक गया हो 
धीरे धीरे आँगन में फिर धुप सिसकती रहती है 
कब आते हो कब जाते हो

बंद कमरे में कभी कभी जब दीये की लौ हिल जाती है तो 
एक बड़ा सा साया मुझको घूँट घूँट पीने लगता है 
आँखें मुझसे दूर बैठकर मुझको देखती रहती है
कब आते हो कब जाते हो 

दिन में कितनी बार मुझको -  तुम याद आते हो
- लेखक: गुलज़ार